पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
वक्ताओं ने कहा- भारतीय भाषाएं भारतीयता की सेतु

रायपुर। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व अध्ययनशाला, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला तथा संत शदाराम साहिब सिंधी अध्ययन केंद्र द्वारा, भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से 12 फरवरी को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया ।
संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय भाषाओं को औपनिवेशिक दृष्टिकोण से मुक्त कर उनके सांस्कृतिक, दार्शनिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करना है। इसमें पाणिनीय व्याकरण, लोकभाषाएँ, जनजातीय भाषाएँ, भाषा नीति, अनुवाद परंपरा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा भाषाई विविधता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया । संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में  मुख्य अतिथि प्रभात मिश्र अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के रुप में शामिल हुए, उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय भाषाओं में व्यक्त साहित्य का मूल स्वर एक है। इसे पहचानने की आवश्यकता है। भारतीय मनीषा ने सदैव उपनिवेशवाद का प्रतिरोध किया और संस्कृति को संरक्षित करने का काम किया।


उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल ने की कहा कि सभी भारतीय भाषाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। भारतीय भाषाएं अध्ययन अध्यापन में प्रयुक्त हों। युवा शोध छात्र अंतर अनुशासनिक शोध करके नए प्रतिमान और निष्कर्ष स्थापित कर सकते हैं।
सारस्वत वक्ता  के रुप में प्रो. अजय शुक्ल गोरखपुर विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सांस्कृतिक, दार्शनिक परिप्रेक्ष्य को समझना आवश्यक है।
हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए ।भाषा हमारी अस्मिता है।
पैनल डिसकशन सत्र में छत्रपति शिवाजी विश्वविद्यालय मुंबई के कुलपति प्रो. केशरी लाल वर्मा ने कहा कि भारतीय भाषायी विविधता हमारी पहचान है l
इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के पूर्व प्रोफेसर आई. डी. तिवारी ने कहा कि भाषा एक बरगद है, हम भाषा के माध्यम से उसके जड़ों से जुड़ते हैं l शैलेश मिश्रा सहायक निदेशक रूसा उच्च शिक्षा विभाग रायपुर परिचर्चा में कहा कि वाणी परम् ब्रह्म है,वाणी एक माध्यम है l पारंपरिक भाषा कभी पुरानी नहीं होती l
द्वितीय सत्र में  साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला के पूर्व प्रोफेसर एवं भाषाविद चित्तरंजन कर ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषा चेतना को जगाती है l प्रत्येक भाषा केवल संस्कृति और संप्रेषण मात्र नहीं वरन वह विश्व चेतना जगाती है l हम सबमें चेतना पहले से ही है, बस स्वयं को जानना और जगाना ज़रूरी है l
विज्ञान महाविद्यालय के अंग्रेजी डिपार्टमेंट के डॉ. सुनयना मिश्रा ने कहा कि जब भाषा एकत्रित होती है तब वह एकीकृत हो जाती हैं l भाषा हमारे संस्कार को जीवंतता प्रदान करती है l नवीन कॉलज के प्रभारी प्राचार्य बी. के. पटेल जांजगीर-चांपा ने कहा कि भारत में भाषाओं का विशेष महत्व है l भाषायी संरक्षण कर दस्तावेजीकरण करना आवश्यक है
विज्ञान महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. सविता सिंह ने कहा कि देश में जितनी भी भाषाएँ हैं सबमें समानता का भाव है l
बलरामपुर जिले से  डॉ. पुनीत राय जी अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत एक सांस्कृतिक विस्मय है l विविधता एवं सामंजस्य की जीवंत परम्परा यहाँ मौजूद है l
संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. बी. एल. सोनेकर ने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति पर हमेशा गर्व होना चाहिए l भाषा के द्वारा ही हम अपने आपको सभी जगह प्रस्तुत करते हैं l संगोष्ठी का संयोजन प्रो. प्रियंवदा श्रीवास्तव, प्रो. मधुलता बारा, डॉ. गिरजाशंकर गौतम, डॉ. नितेश कुमार मिश्रा एवं  आयोजन सचिव डॉ. स्मिता शर्मा के द्वारा किया गया। शिक्षकों, शोधार्थियों, स्वतंत्र शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों ने शोध पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया l इस आयोजन में बड़ी संख्या में विद्यार्थी,शोधार्थी एवं शिक्षकगण मौजूद रहे l