लेखक: रमेश जायभाये

एसीटीआरईसी में उन्नत प्रोटॉन उपचार ने भारत में कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में जोड़ा अत्यधिक सटीक उपचार का एक नया विकल्प

मुंबई। किसी परिवार को जब पहली बार यह सुनने को मिलता है कि “कैंसर है”, तो उसके मन में सबसे पहले तकनीक से जुड़े सवाल नहीं आते। सवाल बेहद सरल होते हैं—क्या इसका इलाज संभव है? कहां उपचार कराया जाए? किस तरह का उपचार जरूरी होगा? और क्या इलाज के दौरान शरीर के स्वस्थ हिस्सों को सुरक्षित रखा जा सकता है?

ये सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब ट्यूमर किसी महत्वपूर्ण अंग के बेहद करीब हो या किसी बच्चे को रेडिएशन उपचार की जरूरत हो और उसका शरीर अभी विकास की अवस्था में हो। ऐसी परिस्थितियों में प्रोटॉन थेरेपी कैंसर उपचार का एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त विकल्प बनकर सामने आई है।

मुंबई के नवी मुंबई स्थित एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट, रिसर्च एंड एजुकेशन इन कैंसर (एसीटीआरईसी) में प्रोटॉन बीम थेरेपी ने भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कैंसर चिकित्सा व्यवस्था में रेडिएशन उपचार का एक अत्यंत सटीक विकल्प उपलब्ध कराया है। हालांकि प्रोटॉन थेरेपी एसीटीआरईसी के व्यापक कैंसर नियंत्रण प्रयास का केवल एक हिस्सा है। संस्थान में कैंसर की रोकथाम, शुरुआती पहचान, उपचार और अनुसंधान को एक-दूसरे से जोड़कर काम किया जाता है। एसीटीआरईसी भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन अनुदान सहायता प्राप्त संस्थान है और टाटा मेमोरियल सेंटर का हिस्सा है।

रोकथाम अब भी पहला कदम

भारत में कैंसर का बढ़ता बोझ उपचार सुविधाओं पर दबाव बढ़ा रहा है। एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट, रिसर्च एंड एजुकेशन इन कैंसर (एसीटीआरईसी) के निदेशक डॉ. पंकज चतुर्वेदी इस बात पर जोर देते हैं कि केवल अस्पतालों और उपचार सुविधाओं का विस्तार इस चुनौती का समाधान नहीं है। रोकथाम योग्य कैंसर के मामलों को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इस प्रयास में तंबाकू एक प्रमुख मुद्दा है। धूम्रपान तथा धुआं रहित या चबाने वाले तंबाकू का सेवन विशेष रूप से मुंह और फेफड़ों के कैंसर सहित कई प्रकार के कैंसर से जुड़ा है। इसलिए तंबाकू छोड़ने में सहायता करना कैंसर की शुरुआत से पहले ही हस्तक्षेप का अवसर देता है।तंबाकू छोड़ने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए तंबाकू-निरोधक सेवाएं और क्विटलाइन सहायता उपलब्ध करा सकती हैं।

मुंह के कैंसर के मामले में लंबे समय तक बने रहने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। खासकर तंबाकू का सेवन करने वालों में ऐसा घाव जो ठीक न हो, असामान्य धब्बा या सूजन शुरुआती जांच का संकेत हो सकता है।

एसीटीआरईसी के सेंटर फॉर कैंसर एपिडेमियोलॉजी (सीसीई) की उप निदेशक डॉ. गौरवी मिश्रा कैंसर नियंत्रण के व्यापक जनसंख्या आधारित पहलू पर काम करती हैं। महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययन से यह समझने में मदद मिलती है कि कैंसर के मामले किन क्षेत्रों और आबादी में अधिक हैं तथा रोकथाम और शुरुआती पहचान के प्रयासों को कहां मजबूत किया जाना चाहिए।

गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर रोकथाम और शुरुआती पहचान के महत्व को स्पष्ट करता है। इसमें एचपीवी टीकाकरण और स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहीं, स्तन कैंसर के मामले में समय पर पहचान उपचार प्रबंधन को प्रभावित कर सकती है।

एसीटीआरईसी में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनुज कैंसर उपचार में शुरुआती निदान के महत्व को रेखांकित करती हैं।

प्रोटॉन थेरेपी: जहां सटीकता मायने रखती है

जिन मरीजों को रेडिएशन उपचार की आवश्यकता होती है, उनके लिए उद्देश्य केवल ट्यूमर को नष्ट करना नहीं होता। उपचार के दौरान आसपास के स्वस्थ ऊतकों पर अनावश्यक रेडिएशन को कम करना भी महत्वपूर्ण होता है।यहीं प्रोटॉन थेरेपी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

पारंपरिक रेडिएशन उपचार में सामान्यतः फोटॉन या एक्स-रे का उपयोग होता है, जबकि प्रोटॉन थेरेपी में आवेशित प्रोटॉन कणों का उपयोग किया जाता है। इनके भौतिक गुण चिकित्सकों को चयनित ट्यूमर पर उपचार की आवश्यक खुराक को अधिक सटीकता से केंद्रित करने और आसपास के सामान्य ऊतकों पर रेडिएशन के प्रभाव को कम करने का अवसर देते हैं।

एसीटीआरईसी के अनुसार, प्रोटॉन थेरेपी विशेष रूप से बच्चों, मस्तिष्क और रीढ़ के ट्यूमर, सिर एवं गर्दन के ट्यूमर—जिनमें खोपड़ी के आधार और पैरानैसल साइनस के ट्यूमर शामिल हैं—तथा हड्डी और सॉफ्ट-टिश्यू ट्यूमर के मामलों में उपयोगी हो सकती है। अन्य कैंसर में इसकी भूमिका पर भी अनुसंधान जारी है।

बच्चों के मामले में यह तकनीक विशेष महत्व रखती है। उनका शरीर अभी विकसित हो रहा होता है और स्वस्थ ऊतकों पर अनावश्यक रेडिएशन को सीमित करना दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है। एसीटीआरईसी की सुविधा में बहुत छोटे बच्चों के उपचार के दौरान एनेस्थीसिया की व्यवस्था भी है।

एसीटीआरईसी की प्रोटॉन सुविधा को मई 2023 में राष्ट्र को समर्पित किया गया और अगस्त 2023 में यहां मरीजों का उपचार शुरू हुआ। इसमें 360 डिग्री घूमने वाली गैण्ट्री वाली तीन उपचार कक्ष हैं। यहां पेंसिल बीम स्कैनिंग तकनीक के माध्यम से इंटेंसिटी मॉड्यूलेटेड प्रोटॉन थेरेपी (आईएमपीटी) दी जा सकती है। रोबोटिक ट्रीटमेंट काउच मरीज की सटीक स्थिति सुनिश्चित करने में सहायता करते हैं। हालांकि प्रोटॉन थेरेपी हर कैंसर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है।

एसीटीआरईसी में विशेषज्ञों की रोग-विशिष्ट टीम यह तय करती है कि किसी मरीज और उसके ट्यूमर को प्रोटॉन थेरेपी से वास्तविक लाभ मिलने की संभावना है या नहीं।

इसलिए प्रोटॉन थेरेपी पारंपरिक रेडिएशन उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि उपयुक्त मरीजों के लिए उपलब्ध एक अतिरिक्त और अत्यधिक सटीक उपचार विकल्प है।

भारत में अभी सीमित केंद्रों पर उपलब्ध

एसीटीआरईसी में प्रोटॉन थेरेपी की उपलब्धता का महत्व केवल इसकी अत्याधुनिक तकनीक तक सीमित नहीं है। सरकारी जानकारी के अनुसार भारत में वर्तमान में दो परिचालित प्रोटॉन थेरेपी केंद्र हैं—नवी मुंबई में एसीटीआरईसी और चेन्नई में अपोलो प्रोटॉन कैंसर सेंटर। फरवरी 2026 में लोकसभा में दिए गए एक उत्तर के अनुसार, टाटा मेमोरियल सेंटर ने 31 दिसंबर 2025 तक एसीटीआरईसी में 748 मरीजों का उपचार किया था।

इस सुविधा में उपचार की पहुंच पर भी ध्यान दिया गया है। सरकारी जानकारी के अनुसार, सुविधा शुरू होने के बाद 541 मरीजों को एसीटीआरईसी में प्रोटॉन थेरेपी दी गई, जिनमें 65 प्रतिशत मरीजों का उपचार रियायती दर पर हुआ, जबकि 27 प्रतिशत मरीजों को रोगी कल्याण और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) सहायता के माध्यम से निशुल्क उपचार या आर्थिक सहायता मिली।

मरीजों और परिवारों के लिए इसका महत्व केवल अत्याधुनिक तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी विशेष चिकित्सा जरूरतमंद मरीजों तक कितनी पहुंच बना सकती है।

उपचार के पीछे अनुसंधान

एसीटीआरईसी का प्रोटॉन कार्यक्रम केवल मरीजों के उपचार तक सीमित नहीं है। संस्थान पार्टिकल थेरेपी की भूमिका पर अनुसंधान भी कर रहा है। इसमें रेडिएशन बायोलॉजी, पार्टिकल फिजिक्स, तकनीकी मूल्यांकन और स्वास्थ्य-अर्थशास्त्र जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

एसीटीआरईसी के कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआई) के उप निदेशक डॉ. सोराब दलाल भविष्य की कैंसर चिकित्सा विकसित करने में मूलभूत अनुसंधान के महत्व पर जोर देते हैं।

कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिक कैंसर की जैविक प्रकृति का अध्ययन करते हैं और यह समझने का प्रयास करते हैं कि प्रयोगशाला में प्राप्त निष्कर्षों को भविष्य में मरीजों के उपचार तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।

शोधकर्ता भारतीय मरीजों पर आधारित ट्यूमर मॉडल और वंशानुगत कैंसर सिंड्रोम पर भी काम कर रहे हैं। इसके अलावा औषधीय पौधों, रेडियोआइसोटोप, पहले से उपलब्ध दवाओं के नए उपयोग तथा नए यौगिक विकसित करने जैसे क्षेत्रों में भी अनुसंधान किया जा रहा है।

किसी भी संभावित उपचार पद्धति को मरीजों तक पहुंचाने से पहले वैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से उसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता स्थापित करना आवश्यक है।

तकनीक से आगे उपचार की पहुंच

उन्नत उपचार के लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बुनियादी ढांचा, विशेषज्ञता और संस्थागत सहयोग भी आवश्यक है।एसीटीआरईसी के उप निदेशक डॉ. नवीन खत्री संस्थान की व्यापक नैदानिक और संस्थागत क्षमता को मजबूत करने के प्रयासों का हिस्सा हैं।

एसीटीआरईसी अपनी उपचार सुविधाओं का विस्तार भी कर रहा है। इनमें 370 बिस्तरों वाले हेमेटोलिम्फॉइड ब्लॉक और 12-लीनियर-एक्सीलरेटर आईआरओसी सुविधा जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।

टाटा मेमोरियल सेंटर व्यापक नेशनल कैंसर ग्रिड का भी हिस्सा है, जो कैंसर संस्थानों को जोड़ने और विशेषज्ञता तथा उपचार मानकों के आदान-प्रदान में सहायता करता है।

सटीकता का उद्देश्य

कैंसर की लड़ाई रेडिएशन मशीन से शुरू नहीं होती। यह जोखिम को समझने, रोकथाम योग्य बीमारी को कम करने और लक्षणों की समय पर पहचान से शुरू होती है।

लेकिन जब कैंसर हो जाता है, तब उपचार के विकल्प भी लगातार विकसित हो रहे हैं।

एसीटीआरईसी में प्रोटॉन थेरेपी ऐसा ही एक विकल्प है—ऐसी तकनीक जो चयनित मामलों में आसपास के स्वस्थ ऊतकों को बचाते हुए ट्यूमर तक रेडिएशन अधिक सटीकता से पहुंचाने का अवसर देती है।

इसका महत्व केवल तकनीक की जटिलता में नहीं, बल्कि इस बात में है कि क्या सही मरीज के लिए सही उपचार सही समय पर उपलब्ध हो सकता है।

यही वह बिंदु है जहां प्रोटॉन थेरेपी, चिकित्सकीय विशेषज्ञता और कैंसर अनुसंधान एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

कैंसर उपचार का भविष्य केवल बीमारी का अधिक प्रभावी उपचार करने में नहीं, बल्कि प्रत्येक मरीज के लिए उपयुक्त उपचार पहचानने और उसे जरूरत के समय सुलभ बनाने में भी निहित है।
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